शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

प्राचीन समय में भारत की शिक्षा पध्दति कैसी थी ??

भारत की शिक्षा पध्दति कैसी थी ??



दोस्तों हम सभी जानते है की भारत प्राचीन समय से ही विश्व गुरु रहा है! दोस्तों क्या आप जानते है की क्यों भारत को सदियों से विश्व गुरु कहा जाता है, जिस प्रकार आज दुनिया के सभी लोग कैंब्रिज और ऑक्सफ़ोर्ड जैसे विश्व विद्यालयों  में पढ़ने जाते है ठीक उसी प्रकार सदियों पहले देश विदेशो से लोग भारत में शिक्षा ग्रहण करने आया करते थे और साथ ही यह के संस्कार यह के रीती रिवाजो और मान्यताओं का अध्य्यन करने आया करते थे!
किस प्रकार यह पर धर्म का निर्वाहन किया जाता था शिक्षा क्या होती थी नैतिक शिक्षा क्या होती थी इस प्रकार की समस्त जानकारिया प्राप्त की जाती थी !


दोस्तों किसी भी देश की उनत्ति  का आकलन उस देश की शिक्षा व्यवस्था से की जाती है, क्योकि कोई भी समाज हो या देश हो वहां की स्थति शिक्षा पध्दति पर अवश्य निर्भर होती है क्योकि शिक्षा एक ऐसी व्यवस्था है जहा से नागरिक अपने देश की और देश से विश्व की आर्थिक और सामाजिक स्तिथि को बदल सकते है!! तो आइये दोस्तों मै आज आपको भारत की प्राचीन शिक्षा पध्दति के बारे में कुछ जानकारिया देना चाहता हु की किस प्रकार भारत अपनी शिक्षा के दम पर विश्व गुरु बना!!

गुरुकुल मे:-



प्राचीन समय में भारत की शिक्षा प्रणाली आज जैसे विद्यालयों में नहीं होती थी बल्कि गुरुकुलों में होती थी और ये गुरुकुल नगरों व् गावो से दूर जंगलो में होते थे, इन गुरुकुलों की खास बात यह होती थी की इनमे पढ़ने वाले शिष्यों में एक राजकुमार से लेकर एक गरीब बच्चे तक सभी सामान्य रूप से पढ़ते थे उन्हें शिक्षा और संस्कार एक साथ सामान रूप से दिया जाता था , शिक्षा ग्रहण करने से पूर्व शिष्यों का उपनयन संस्कार करना जरुरी होता था और उसी के बाद शिष्यों को शिक्षा ग्रहण का का अधिकार प्राप्त होता था और ये सारे संस्कार गुरु के सानिध्य में किये जाते थे तदुपरांत शिष्यों को गुरुकुल में रहकर ही समावर्तन तक ( लगभग १७ वर्ष की आयु तक ) गुरु के सानिध्य में शिक्षा ग्रहण करनी होती थी

गुरुकुलों की शिक्षा पद्द्यति कैसी थी :-


गुरुकुल की शिक्षा वेदाधारित  थी अर्थात वेदो के अनुसार शिक्षा प्रदान की जाती थी और वेदो का अनुसरण किया जाता था अर्थात शिक्षा की क्या परिभाषा है शिक्षा किस प्रकार ग्रहण किया जाता है और समाज में इसका कैसे उपयोग किया जाता है ये सभी बाते वेदो के आधार पर ही शिष्यों को प्रदान की जाती थी!
ऋषि मुनियो द्वारा दी जाने वाली शिक्षा इतनी वैज्ञानिक होती थी की उसमे समस्त शिष्यों के साथ साथ समाज का भी कल्याण निहित होता थाऔर शिष्यों की ये यात्रा गुरुकुल से विश्वकुल तक चलती थी वे उपनिषद से उपग्रह तह की यात्रा  करते थे!!

गुरुओ द्वारा ३ तरीको से शिक्षा दी जाती थी !!

(१)।  श्रवण : सुनना :
(२) मनन : गुनना:
(३) निदिध्यासन :सत्याचरण :


अर्थात गुरुओ द्वारा जो शिक्षा दी जाती थी उसे पहले श्रवण करना  फिर उसे मन ही मन गुनना या विचार करना और उसके बाद उसे अपने आचरण में ले आना सत्याचरण इस प्रकार शिक्षा दी जाती थी ! दोस्तों उस समय में कागज या कलम न होने के कारण सुन सुन कर ही शिक्षा ग्रहण की जाती थी!!